Friday, September 7, 2012

उफ्फ़! ये बारिश...

जब भी आती है
नम कर जाती है,
भीगती है, भिंगाती है
फिर अरमानों की तपती ज़मीं को
और प्यासा कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...

दो बूँद, दो-चार बूँद
फिर ज़ोर से झमझमाती है,
कहीं पे थमकर, कही फिसल
आशाओं की जलती लौ को
धुवाँ-धुवाँ कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...

थमकर, गरजकर, बरसकर
सुरीली धुन ये सुनाती है,
नए-नए कुछ ख्वाब बुनती है
फिर रिश्तों से बनते इस शहर में
और अकेला कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...

No comments:

Post a Comment