जब भी आती है
नम कर जाती है,
भीगती है, भिंगाती है
फिर अरमानों की तपती ज़मीं को
और प्यासा कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...
दो बूँद, दो-चार बूँद
फिर ज़ोर से झमझमाती है,
कहीं पे थमकर, कही फिसल
आशाओं की जलती लौ को
धुवाँ-धुवाँ कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...
थमकर, गरजकर, बरसकर
सुरीली धुन ये सुनाती है,
नए-नए कुछ ख्वाब बुनती है
फिर रिश्तों से बनते इस शहर में
और अकेला कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...
नम कर जाती है,
भीगती है, भिंगाती है
फिर अरमानों की तपती ज़मीं को
और प्यासा कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...
दो बूँद, दो-चार बूँद
फिर ज़ोर से झमझमाती है,
कहीं पे थमकर, कही फिसल
आशाओं की जलती लौ को
धुवाँ-धुवाँ कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...
थमकर, गरजकर, बरसकर
सुरीली धुन ये सुनाती है,
नए-नए कुछ ख्वाब बुनती है
फिर रिश्तों से बनते इस शहर में
और अकेला कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...
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