खुशनसीब है वो
जो रोज तुम्हारे लबों से जा लगती है
कुछ क्षण को ही सही
जब वो तुम्हारी उँगलियों मे आ बसती है
मेरी रूह जल उठती है
कैसा इश्क है !
हरएक कश तुम्हारी रूह तक उतरता है
और निचोड़ लेता है
तुम्हारे सुर्ख लबों की रंगत
कैसा इश्क है !
ज़रा सा बिछड़ा नहीं
मरोड़ देता है ज़बां
मोड़ लेता है अपनी तरफ
कैसा इश्क है !
उससे सुख और दुःख दोनों बाँटते हो
मैं उस जैसा हो नही सकता
वो दिन के कई पलों मे तुम्हारे साथ होती है
और मैं .... मैं खुद को खो नहीं सकता
मुझे तो महसूस करना है
वो जो महसूस करती है
तुम्हारे हाथो में |
उस क्षण को मैं जी पाऊं
तुम्हारी उँगलियों को मे फँस के
तुम्हारे लबों पे लोट के
अपने ही हर कण को
राख होते देखूं ...
मैं मृत्यु पाश को जी पाऊं |
मुझे पता है
जो रोज तुम्हारे लबों से जा लगती है
कुछ क्षण को ही सही
जब वो तुम्हारी उँगलियों मे आ बसती है
मेरी रूह जल उठती है
कैसा इश्क है !
हरएक कश तुम्हारी रूह तक उतरता है
और निचोड़ लेता है
तुम्हारे सुर्ख लबों की रंगत
कैसा इश्क है !
ज़रा सा बिछड़ा नहीं
मरोड़ देता है ज़बां
मोड़ लेता है अपनी तरफ
कैसा इश्क है !
उससे सुख और दुःख दोनों बाँटते हो
मैं उस जैसा हो नही सकता
वो दिन के कई पलों मे तुम्हारे साथ होती है
और मैं .... मैं खुद को खो नहीं सकता
मुझे तो महसूस करना है
वो जो महसूस करती है
तुम्हारे हाथो में |
उस क्षण को मैं जी पाऊं
तुम्हारी उँगलियों को मे फँस के
तुम्हारे लबों पे लोट के
अपने ही हर कण को
राख होते देखूं ...
मैं मृत्यु पाश को जी पाऊं |
मुझे पता है
तुम कभी नहीं बाँटोगे मुझसे
जानता हूँ जीवन मे वो क्षण भी नही आएगा
जब उस बचे टुकड़े से मैं तुम्हे छीन पाऊँगा
मैं उसकी बची जिंदगी से तुम्हे मांगता हूँ
मैं कैसे जान पाऊँगा
कैसा इश्क है !
मैं, तुम तो हो नहीं सकता
काश मैं सिगरेट होता
और जान पाता
ये कैसा इश्क है !जब उस बचे टुकड़े से मैं तुम्हे छीन पाऊँगा
मैं उसकी बची जिंदगी से तुम्हे मांगता हूँ
मैं कैसे जान पाऊँगा
कैसा इश्क है !
मैं, तुम तो हो नहीं सकता
काश मैं सिगरेट होता
और जान पाता
No comments:
Post a Comment