Friday, September 7, 2012

उमड़ते घुमड़ते बादल...

नीले नीले से शांत आस्मां में
उमड़ते घुमड़ते बादल जब भी
कही पे ठहर से जाते हैं,
कुछ रिमझिमाती बूँदें और
कुछ भीनी खुश्बुवों से
मिट जाती हैं,
महक उठती हैं तनहाइयाँ,
भले ही समेटे रहता हो
खुद को खामोशियों के दायरे में
देख कुछ सतरंगी सपने तो फिर भी
किसी कोने में बुन ही जाते हैं;
भूल जाता है अक्सरहा
कि ये बादल भी समान
मरीचिका है कुछ और नहीं,
अभी बरसेंगे और फिर
छोड़ जायेंगे पीछे अपने
वही ख़ामोशी वही तन्हाई |

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