कितने दिन हो गए
कुछ लिखे हुए
क्या करूँ
नहीं मिलते शब्द
नहीं बनती पंक्तियाँ
नहीं आती समझ
कुछ तीखी सी
कुछ मीठी सी
कुछ चाशनी में पिरोई बातें
वो बातें
जो न कभी तुम कह सकती हो
जो न कभी मैं कह सकता हूँ |
कितने दिन हो गए
दिल को बयां किये हुए
क्या करूँ
नहीं मिलते शब्द
नहीं निकलते जज़्बात
नहीं आती समझ
कुछ झूठी सी
कुछ बनावटी सी
कुछ लाग-लपेट की बातें
वो बातें
जो न कभी तुम कह सकी
जो न कभी मैं कह सका |
कितने दिन हो गए
कुछ बातें किये हुए
क्या करूँ
नहीं मिलते हमक्या करूँ
नहीं मिलते शब्द
नहीं बनती पंक्तियाँ
नहीं आती समझ
कुछ तीखी सी
कुछ मीठी सी
कुछ चाशनी में पिरोई बातें
वो बातें
जो न कभी तुम कह सकती हो
जो न कभी मैं कह सकता हूँ |
कितने दिन हो गए
दिल को बयां किये हुए
क्या करूँ
नहीं मिलते शब्द
नहीं निकलते जज़्बात
नहीं आती समझ
कुछ झूठी सी
कुछ बनावटी सी
कुछ लाग-लपेट की बातें
वो बातें
जो न कभी तुम कह सकी
जो न कभी मैं कह सका |
कितने दिन हो गए
कुछ बातें किये हुए
क्या करूँ
नहीं मिटती ख्वाहिशें
नहीं आती समझ
कुछ अनकही सी
कुछ अनजानी सी
कुछ आधी-अधूरी बातें
वो बातें
जो न कभी तुम समझ पाओगे
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