Friday, September 7, 2012

कब से रूठा रूठा हूँ...

मेरी आँखों का पानी सूखने की आ गयी नौबत
 कोई आके मना लेता, मैं कब से रूठा रूठा हूँ | 
मेरी दुनिया में भी कुछ रंग सजा देता 
कोई आके मना लेता, मैं कब से रूठा रूठा हूँ |
मेरी जिद का भी कोई मान रख ले, प्यार से तक ले 
कोई थपकी लगा देता, मैं कब से रूठा रूठा हूँ | 
मेरी हद है बहुत कम और तुम्हें हद्तर इज़ाज़त है 
गले से ही लगा लेता, मैं कब से रूठा रूठा हूँ |
मुझे गर दोस्त कहते हो, मुझे महसूस होने दो
दोस्ती ही निभा लेता, मैं कब से रूठा रूठा हूँ |

उमड़ते घुमड़ते बादल...

नीले नीले से शांत आस्मां में
उमड़ते घुमड़ते बादल जब भी
कही पे ठहर से जाते हैं,
कुछ रिमझिमाती बूँदें और
कुछ भीनी खुश्बुवों से
मिट जाती हैं,
महक उठती हैं तनहाइयाँ,
भले ही समेटे रहता हो
खुद को खामोशियों के दायरे में
देख कुछ सतरंगी सपने तो फिर भी
किसी कोने में बुन ही जाते हैं;
भूल जाता है अक्सरहा
कि ये बादल भी समान
मरीचिका है कुछ और नहीं,
अभी बरसेंगे और फिर
छोड़ जायेंगे पीछे अपने
वही ख़ामोशी वही तन्हाई |

कितने दिन हो गए...

कितने दिन हो गए
कुछ लिखे हुए
क्या करूँ
नहीं मिलते शब्द
नहीं बनती पंक्तियाँ
नहीं आती समझ
कुछ तीखी सी
कुछ मीठी सी
कुछ चाशनी में पिरोई बातें
वो बातें
जो न कभी तुम कह सकती हो
जो न कभी मैं कह सकता हूँ |

कितने दिन हो गए
दिल को बयां किये हुए
क्या करूँ
नहीं मिलते शब्द
नहीं निकलते जज़्बात
नहीं आती समझ
कुछ झूठी सी
कुछ बनावटी सी
कुछ लाग-लपेट की बातें
वो बातें
जो न कभी तुम कह सकी
जो न कभी मैं कह सका |

कितने दिन हो गए
कुछ बातें किये हुए
क्या करूँ
नहीं मिलते हम
नहीं मिटती ख्वाहिशें
नहीं आती समझ
कुछ अनकही सी
कुछ अनजानी सी
कुछ आधी-अधूरी बातें
वो बातें
जो न कभी तुम समझ पाओगे
जो न कभी मैं समझा पाऊँगा |

ये कैसा इश्क है !


खुशनसीब है वो
जो रोज तुम्हारे लबों से जा लगती है
कुछ क्षण को ही सही
जब वो तुम्हारी उँगलियों मे आ बसती है
मेरी रूह जल उठती है
कैसा इश्क है !

हरएक कश तुम्हारी रूह तक उतरता है
और निचोड़ लेता है
तुम्हारे सुर्ख लबों की रंगत
कैसा इश्क है !

ज़रा सा बिछड़ा नहीं
मरोड़ देता है ज़बां
मोड़ लेता है अपनी तरफ
कैसा इश्क है !

उससे सुख और दुःख दोनों बाँटते हो
मैं उस जैसा हो नही सकता
वो दिन के कई पलों मे तुम्हारे साथ होती है
और मैं .... मैं खुद को खो नहीं सकता

मुझे तो महसूस करना है
वो जो महसूस करती है
तुम्हारे हाथो में |

उस क्षण को मैं जी पाऊं
तुम्हारी उँगलियों को मे फँस के
तुम्हारे लबों पे लोट के
अपने ही हर कण को
राख होते देखूं ...
मैं मृत्यु पाश को जी पाऊं |

मुझे पता है
तुम कभी नहीं बाँटोगे मुझसे
जानता हूँ जीवन मे वो क्षण भी नही आएगा
जब उस बचे टुकड़े से मैं तुम्हे छीन पाऊँगा
मैं उसकी बची जिंदगी से तुम्हे मांगता हूँ
मैं कैसे जान पाऊँगा
कैसा इश्क है !

मैं, तुम तो हो नहीं सकता
काश मैं सिगरेट होता
और जान पाता
ये कैसा इश्क है !

उफ्फ़! ये बारिश...

जब भी आती है
नम कर जाती है,
भीगती है, भिंगाती है
फिर अरमानों की तपती ज़मीं को
और प्यासा कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...

दो बूँद, दो-चार बूँद
फिर ज़ोर से झमझमाती है,
कहीं पे थमकर, कही फिसल
आशाओं की जलती लौ को
धुवाँ-धुवाँ कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...

थमकर, गरजकर, बरसकर
सुरीली धुन ये सुनाती है,
नए-नए कुछ ख्वाब बुनती है
फिर रिश्तों से बनते इस शहर में
और अकेला कर जाती है;
उफ्फ़! ये बारिश
कैसा असर कर जाती है...