भोर की पहली किरण
ओस के साथ जब आती होगी,
भींचते- मींचते अधखुली आँखों में
ज़िन्दगी कभी तो, मुस्कुराती होगी ?
खिली धूप में भागते दौड़ते
परछाईं छाँव जब ढूंढती होगी,
यादें होंगी जब आँखों में तैरती
हवा कहीं तो, चुभती होगी ?
ढूंढती फिरती होगी तन्हाई
शाम जब भी ढलती होगी,
पास कितना भी हो सारा जहां
कमी कहीं तो, खलती होगी ?
ओस के साथ जब आती होगी,
भींचते- मींचते अधखुली आँखों में
ज़िन्दगी कभी तो, मुस्कुराती होगी ?
खिली धूप में भागते दौड़ते
परछाईं छाँव जब ढूंढती होगी,
यादें होंगी जब आँखों में तैरती
हवा कहीं तो, चुभती होगी ?
ढूंढती फिरती होगी तन्हाई
शाम जब भी ढलती होगी,
पास कितना भी हो सारा जहां
कमी कहीं तो, खलती होगी ?
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