Tuesday, January 6, 2015

चाहत...

निकले थे घर से पाने को कुछ
चले थे अपना बचपन छोड़
राहें किधर ये ले जायेंगी
पता नहीं था कोई मोड़;

मोड़ जो भी अच्छा लगा
मुड़ गए वहीँ से हम
संग खुशियाँ थोड़ी सी थी 
थोड़े से थे साथ में ग़म;

पाने को पैसा, नाम भले हो
पर खोने को भी कम नहीं है
घर, परिवार, वो गली मुहल्ला
लोग, दोस्त, सुकूं कुछ भी नहीं है;

सोचते हैं अकेले में अक्सर
ढूँढा करते अपनों के साये
पाने को जितना निकले थे हम
क्या पीछे उससे ज्यादा छोड़ आये ?

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