Tuesday, January 6, 2015

एक बार फिर दिवाली मनाते हैं...

आओ एक बार फिर
दिवाली मनाते हैं 
अंदर के अँधेरे को 
बाहर की रौशनी से 
थोड़ा मिटाते हैं...

20 में 100 और 
9 में 12 का आंकड़ा बैठाकर 
चौखट पे 2
और खिड़की पे एक जलाकर 
दीयों और मोमबत्तियों से 
दुनिया जगमगाते हैं;
आओ एक बार फिर
दिवाली मनाते हैं 
अंदर के अँधेरे को 
बाहर की रौशनी से 
थोड़ा मिटाते हैं...

टिकिया वाला सांप और 
दर्जन भर चुटपुटी 
बम बीड़ी, चटाई, एटम
घिरनी, राकेट, फुलझड़ी,
जो भी बटोरा है  
सिक्कों में जोड़कर 
उसे देकर अकेलेपन को 
शोर में छिपाते हैं;
आओ एक बार फिर
दिवाली मनाते हैं 
अंदर के अँधेरे को 
बाहर की रौशनी से 
थोड़ा मिटाते हैं...

गाय, घर, गाड़ी 
चीनी के लाकर
मिट्टी की कटोरी में 
बूंदी लड्डू सजाकर 
दिल के किसी कोने में  
एक घरौंदा सजाते हैं
आओ एक बार फिर
दिवाली मनाते हैं 
अंदर के अँधेरे को 
बाहर की रौशनी से 
थोड़ा मिटाते हैं...

चाहत...

निकले थे घर से पाने को कुछ
चले थे अपना बचपन छोड़
राहें किधर ये ले जायेंगी
पता नहीं था कोई मोड़;

मोड़ जो भी अच्छा लगा
मुड़ गए वहीँ से हम
संग खुशियाँ थोड़ी सी थी 
थोड़े से थे साथ में ग़म;

पाने को पैसा, नाम भले हो
पर खोने को भी कम नहीं है
घर, परिवार, वो गली मुहल्ला
लोग, दोस्त, सुकूं कुछ भी नहीं है;

सोचते हैं अकेले में अक्सर
ढूँढा करते अपनों के साये
पाने को जितना निकले थे हम
क्या पीछे उससे ज्यादा छोड़ आये ?