Monday, May 19, 2014

That one day...


One day, when the sun was brigh'
and the birds were flying,
there in a garden 'n' there on a bench
sat holding hands, feeling shy,
lookin' at each other
talkin' through eyes
I did say 'I love you'
and leanin' on you
I asked, may I?
you didn't say anything
gave just a smile
and then we were lost
for some while.

Wednesday, May 7, 2014

ज़िंदा कर दे...

कल देर तक तुझे
निहारता रहा था मैं,
मेरी बात का जवाब देगा
सोचता रहा था मैं;
मैंने तुझे चुन लिया
तू भी मुझे चुनकर
इकबार चुनिन्दा कर दे
दम तोड़ती ख्वाहिशों को मेरी
तू फिर से ज़िंदा कर दे...

जानता हूँ अजीब है
मेरे लिए,
और मुश्किल होगा
तेरे लिए भी;
पर करता हूँ तुझे पसंद
बना कर तू अपनी पसंद
मुझे पसंदीदा कर दे
दम तोड़ती ख्वाहिशों को मेरी
तू फिर से ज़िंदा कर दे...

जानने में वक़्त लगा
मुझे भी,
और मानने में लगेगा
तुझे भी;
पर बसा चुका तुझे मन में
अपने दिल में तू बसा कर
मुझे फिर से बाशिंदा कर दे
दम तोड़ती ख्वाहिशों को मेरी
तू फिर से ज़िंदा कर दे...

तू क्यूँ खोई...

मैं तब सोया, जब मुझे नीँद आई
तू तब सोई, जब मुझे नींद आई

मैं तब जागा, जब पूरी नींद हुई
तू तब जागी, जब मेरी नींद हुई

मैं खुश हुआ, जब मुझे कुछ अच्छा लगा
तू खुश हुई, जब मुझे कुछ अच्छा लगा

मैं तब रोया, जब मुझे दर्द हुआ
तू तब रोई, जब मुझे दर्द हुआ

बहुत बेचैन हुआ, जब मैंने कुछ खो दिया
माँ तू तब खोई, जब मैंने ख़ुद को खो दिया

माँ तू क्यूँ खोई…

ऐसा लगा था...

हवाओं नें दी थी
चुपके से
जब भी दस्तक,
बार बार गया था
दरवाज़े पे
हर आहट पर
ऐसा लगा था
कि तुम आ गए;

न पाकर तुम्हें
वहां पे माना
गहराती थी मायूसी
फिर भी दिल को
आस लगी हो जैसे
पत्तियां भी सरसराई तो
ऐसा लगा था
कि तुम आ गए;

टिमटिमाती
पीछे से आती
रौशनी में
देख अपनी परछाई भी
ठहरता था मैं
निहारता था मैं
हरबार ऐसा लगा था
कि तुम आ गए;

जानती थी
है नामुमकिन सा
फिर भी न जाने क्यूँ
बाहर आने को बेताब सी
तैरती देर से आँखों में
रुक गयी ठिठक कर कहीं
जब ऐसा लगा था
कि तुम आ गए |

दरम्यां

कैसी ख़ामोशी सी
खींचती जा रही है
दरम्यां;

एक अजीब सी दूरी
बनती जा रही है
दरम्यां;

कोई दीवार ना आये
सर उठाये अपने
दरम्यां;

मैं रहूँ और तुम रहो
और रहे बस हम
दरम्यां |

Wednesday, April 16, 2014

सच की शक्ल...

आर या पार के दोराहे पे
ज़िन्दगी उलझी खड़ी है;
यहाँ सच की शक्ल
झूठ से भी बुरी है…

समझना चाहे तो
फिसल जाती है
चाहे मुट्ठी में जकड़ना
पिघल जाती है;
जोड़-तोड़ हिसाब में
फँसी पड़ी है,
यहाँ सच की शक्ल
झूठ से भी बुरी है…

रेत से ईमान आतुर
घरौंदे बिखेरने को
लहरों से इंसान व्याकुल
किनारे समेटने को;
समय की हेरा-फेरी में
सहमती-संभलती है,
यहाँ सच की शक्ल
झूठ से भी बुरी है…