Thursday, August 25, 2016

बाल मजबूर...

चल देता हूँ मैं मुट्ठी बांध कर 
क़िस्मत की लकीर मुझे मिलती नहीं,
अाँख मेरी हर सुबह खुलती है 
पर रोशनी मुझको दिखती नहीं... 

इक ख़्वाब मुझमें भी पलता है 
जो अाग में बेबसी की जलता है,
पानी के जब भी छींटें पड़े तो
मेरी अांखों से वो बह पड़ता है... 

सपना देखूँ या राह तकूँ मैं 
अब अायेगा, कब अाएगा,
मजबूरी की ज़ंजीर को तोड़ 
मुझको अाज़ाद करवाएगा... 

मुझे नई सुबह दिखलाएगा
मुझे नई सुबह दिखलाएगा...