Wednesday, April 16, 2014

सच की शक्ल...

आर या पार के दोराहे पे
ज़िन्दगी उलझी खड़ी है;
यहाँ सच की शक्ल
झूठ से भी बुरी है…

समझना चाहे तो
फिसल जाती है
चाहे मुट्ठी में जकड़ना
पिघल जाती है;
जोड़-तोड़ हिसाब में
फँसी पड़ी है,
यहाँ सच की शक्ल
झूठ से भी बुरी है…

रेत से ईमान आतुर
घरौंदे बिखेरने को
लहरों से इंसान व्याकुल
किनारे समेटने को;
समय की हेरा-फेरी में
सहमती-संभलती है,
यहाँ सच की शक्ल
झूठ से भी बुरी है…